अभीपिछले
फागुन में उसकी आँखों मेंकोई
रंग न था पिछले सावन में उसके गीतों मेंकरुणा
न थी अचानक बड़ी होगई
है बेटी सेमल के पेड़ कीतरह हहा कर बड़ी होगई
है देखते ही देखते।
जब वह जन्मी थी तब कितना पानीहोता
था कुएँ-तालाब में नदी तो हरदमलबालब
भरी रहती थी भादों में कैसीझड़ी
लगती थी वैसी ही एक रातमें
पैदा हुई थी ऐसी झपासी थी किएक
पल के लिए भी लड़ी नहीं टूटरही
थी
अब बड़ी हुईबेटी तब तक सूख चुकेहैं
सारे तालाब गहरे तल में चलागया
है कुएँ का पानी नदी हो गई हैबेगानी काँस और सरकंडोंके
जंगल में कहीं-कहीं बहतीदिखती
हैं पतली पतली धाराएँ ।
पलकें झुका कर सपनों को छोटाकरो
मेरी बेटी नींद को छोटाकरो देर से सूतो पर देर तक नसूतो होठों से बाहर नआये
हँसी आँखों तक पहुंचन
पाये कोई ख़ुशी कलेजे में दबारहे
दुःख भूख और विचारोंको
मारना सीखो अपने को अपने हीभीतर
गाड़ना सीखो
कोमल-कोमलशब्दों
में जारी होती रहींक्रूर
हिदायतें फिर भी बड़ी होगई
बेटी बड़े हो गयेउसके
सपने!
2
बड़ी हो रही हैबेटी बड़ा हो रहा हैउसका
एकांत
वह चाहती है अबभी चिड़ियों सेबतियाना फूलों से उलझना पेड़ों से पीठटिका
कर सुस्ताना पर सब कुछ बदलचुका
है मानो
कम होने लगी है चिड़ियों केकलरव
की मिठास चुभने लगे हैं फूलों के तेज़रंग डराने लगी हैं दरख़्तों कीकाली
छायाएँ
बड़ी हो रही है बेटी बड़े हो रहे हैं भेड़िए बड़े हो रहे है सियार
माँ की करुणा के भीतर फूट रही है बेचैनी पिता की चट्टानी छाती में दिखने लगे हैं दरकने के निशान बड़ी हो रही है बेटी!
3
बाबा बाबा मुझे मकई के झौंरे की तरह मरुए में लटका दो
बाबा बाबा मुझे लाल चावल की तरह कोठी में लुका दो
बाबा बाबा मुझे माई के ढोलने की तरह कठही संदूक में छुपा दो
मकई के दानों को बचाता है छिलकोइया चावल को कन और भूसी ढोलने को बचाता है रेशम का तागा तुझे कौन बचाएगा मेरी बेटी!