Wednesday, 5 December 2012

द्रोण ने एकलव्य से गुरू दक्षिणा मेँ एकलव्य के दाएँ हाथ का अगूंठा मांगा



जन्म - महाभारत काल मृत्यु - यदुवंशी श्रीकृष्ण द्वारा छल से पिता - महाराज हिरण्यधनु माता - रानी सुलेखा बचपन का नाम - अभिद्युम्न ( अभय ) जीवन से शिक्षा -1. अपने लक्ष्य के प्रति लगन होना 2. समस्याओँ से डट कर सामना करना 3. माता पिता और गुरू का आदर करना 4. मन लगाकर परिश्रम करना यदपि  एकलव्य निषाद वंश के राजा थे l निषाद वंश या जाति के संबंध मेँ सर्वप्रथम उल्लेख "तैत्तरीय संहिता" मेँ मिलता है जिसमेँ अनार्योँ के अंतर्गत निषाद आता है l
"
एतरेय ब्राह्मण" ग्रन्थ उन्हेँ क्रूर कर्मा कहता है और सामाजिक दृष्टि से निषाद को शूद्र मानता है l
महाभारत काल मेँ प्रयाग (इलाहाबाद) के तटवर्ती प्रदेश मेँ सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य एकलव्य के पिता निषादराज हिरण्यधनु का था l गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी l उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चन्देरी आदि बड़े राज्योँ के समकक्ष थी l निषाद हिरण्यधनु और उनके सेनापति गिरिबीर की वीरता विख्यात थी l
निषादराज हिरण्यधनु और रानी सुलेखा के स्नेहांचल से जनता सुखी व सम्पन्न थी l राजा राज्य का संचालन आमात्य (मंत्रि) परिषद की सहायता से करता था l निषादराज हिरण्यधनु को रानी सुलेखा द्वारा एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम "अभिद्युम्न" रखा गया l प्राय: लोग उसे "अभय" नाम से बुलाते थे l पाँच वर्ष की आयु मेँ एकलव्य की शिक्षा की व्यवस्था कुलीय गुरूकुल मेँ की गई l
बालपन से ही अस्त्र शस्त्र विद्या मेँ बालक की लगन और एकनिष्ठता को देखते हुए गुरू ने बालक का नाम "एकलव्य" संबोधित किया l एकलव्य के युवा होने पर उसका विवाह हिरण्यधनु ने अपने एक निषाद मित्र की कन्या सुणीता से करा दियाl एकलव्य धनुर्विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था l उस समय धनुर्विद्या मेँ गुरू द्रोण की ख्याति थी l पर वे केवल ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वर्ग को ही शिक्षा देते थे और शूद्रोँ को शिक्षा देने के कट्टर विरोधी थे l महाराज हिरण्यधनु ने एकलव्य को काफी समझाया कि द्रोण तुम्हे शिक्षा नहीँ देँगेl पर एकलव्य ने पिता को मनाया कि उनकी शस्त्र विद्या से प्रभावित होकर आचार्य द्रोण स्वयं उसे अपना शिष्य बना लेँगेlपर एकलव्य का सोचना सही न था - द्रोण ने दुत्तकार कर उसे आश्रम से भगा दियाl
            एकलव्य हार मानने वालोँ मेँ से न था और बिना शस्त्र शिक्षा प्राप्त तिए वह घर वापस लौटना नहीँ चाहता थाल एकलव्य ने वन मेँ आचार्य द्रोण की एक प्रतिमा बनायी और धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगाl शीघ्र ही उसने धनुर्विद्या मेँ निपुणता प्राप्त कर ली l एक बार द्रोणाचार्य अपने शिष्योँ और एक कुत्ते के साथ उसी वन मेँ आएl उस समय एकलव्य धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थेl कुत्ता एकलव्य को देख भौकने लगाl एकलव्य ने कुत्ते के मुख को अपने बाणोँ से बंद कर दियाl कुत्ता द्रोण के पास भागाl द्रोण और शिष्य ऐसी श्रेष्ठ धनुर्विद्या देख आश्चर्य मेँ पड़ गए| वे उस महान धुनर्धर की खोज मेँ लग गए अचानक उन्हे एकलव्य दिखाई दिया जिस धनुर्विद्या को वे केवल क्षत्रिय और ब्राह्मणोँ तक सीमित रखना चाहते थे उसे शूद्रोँ के हाथोँ मेँ जाता देख उन्हेँ चिँता होने लगीl तभी उन्हे अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के वचन की याद आयी| द्रोण ने एकलव्य से पूछा- तुमने यह धनुर्विद्या किससे सीखी? एकलव्य- आपसे आचार्य एकलव्य ने द्रोण की मिट्टी की बनी प्रतिमा की ओर इशारा कियाल द्रोण ने एकलव्य से गुरू दक्षिणा मेँ एकलव्य के दाएँ हाथ का अगूंठा मांगा एकलव्य ने अपना अगूंठा काट कर गुरु द्रोण को अर्पित कर दिया l
कुमार एकलव्य अंगुष्ठ बलिदान के बाद पिता हिरण्यधनु के पास चला आता है l एकलव्य अपने साधनापूर्ण कौशल से बिना अंगूठे के धनुर्विद्या मेँ पुन: दक्षता प्राप्त कर लेता है| आज के युग मेँ आयोजित होने वाली सभी तीरंदाजी प्रतियोगिताओँ मेँ अंगूठे का प्रयोग नहीँ होता है, अत: एकलव्य को आधुनिक तीरंदाजी का जनक कहना उचित होगा |
 पिता की मृत्यु के बाद वह श्रृंगबेर राज्य का शासक बनता हैl अमात्य परिषद की मंत्रणा से वह न केवल अपने राज्य का संचालन करता है, बल्कि निषाद भीलोँ की एक सशक्त सेना और नौसेना गठित करता है और अपने राज्य की सीमाओँ का विस्तार करता है| इस बीच मथुरा नरेश कंस के वध के बाद, कंस के संबंधी मगध नरेश जरासन्ध शिशुपाल आदि के संयुक्त हमलोँ से भयभीत श्रीकृष्ण मथुरा से अपने भाई बलराम व बंधु बांधवोँ सहित पश्चिम की ओर भाग रहे थे|
 तब निषादराज एकलव्य ने श्रीकृष्ण की याचना पर तरस खाकर उन्हेँ सहारा व शरण दियाl ( अधिक जानकारी के लिए पेरियार ललई सिँह यादव द्वारा लिखित एकलव्य नामक पुस्तक पढ़ेँ )एकलव्य की मदद से यादव सागर तट पर सुरक्षित भूभाग द्वारिका मेँ बस गएl
यदुकुल ने धीरे धीरे अपनी शक्तियोँ का विस्तार किया और यादवोँ ने सुरापायी बलराम के नेतृत्व मेँ निषादराज की सीमाओँ पर कब्जा करना प्रारम्भ कर दियाl इसी बीच श्रीकृष्ण ने अपनी नारायणी सेना (प्रच्छन्न युद्ध की गुरिल्ला सेना) भी गठित कर ली थीlअब यादवी सेना और निषादोँ के बीच युद्ध होना निश्चित था| यादवी सेना के निरंतर हो रहे हमलोँ को दबाने के लिए एकलव्य ने सेनापति गिरिबीर के नेतृत्व मेँ कई बार सेनाएँ भेजीँl पर यादवी सेनाओँ का दबाव बढ़ता जाता है| तब एकलव्य स्वयं सेना सहित यादवी सेना से युद्ध करने के लिए प्रस्थान करते है | बलराम और एकलव्य की सेना मेँ भयंकर युद्ध होता है और बलराम की पराजय होती है| बलराम और यादवी सेना को पराजित कर एकलव्य विजय दुंदुभी बजाते हैँ, तभी पीछे से अचानक कृष्ण की नारायणी सेना जो कहीँ बाहर से युद्ध कर लौटी थी, एकलव्य पर टूट पड़ती है| एकलव्य इस अप्रत्याशित हमले से घिरकर रक्तरंजित हो जाते हैँ l ऐसी ही विकट स्थिति मेँ कृष्ण के हाथोँ महाबली एकलव्य का वध होता है | अपने महानायक एकलव्य की कृष्ण के हाथोँ मृत्यु से निषाद क्षुब्ध होते हैँ l यदुकुल पतन के बाद उन्हीँ मेँ से एक निषादवीर के द्वारा कृष्ण की हत्या कर दी गई l
  इतना ही नहीँ यादवी विनाश के बाद जब श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार शेष बचे यदुवंशीय परिवारोँ को लेकर अर्जुन द्वारिका से हस्तिनापुर जा रहे थे | तब बदले की भावना से निषाद-भीलोँ की सेना ने वन पथ मेँ घेरकर भीषण मारकाट मचाई और अर्जुन को पराजित कर पुरूषोँ को बन्दी बना लिया | साथ ही यदुवंश की सुन्दरियोँ-गोपियोँ का अपहरण कर लिया l
" भीलन लूटी गोपिका, ओई अर्जुन ओई बाण ll "
                                 
                                                                    - आशाराम निषाद

Tuesday, 27 November 2012

एकलव्य का बलपूर्वक अंगूठा काटा गया


 
 अभी अपने मित्र इंजीनियर राजेन्द्र प्रसाद से बात हो रही थी। उनका कहना था कि एकलव्य के नाम पर साहित्य या कला में कोई पुरस्कार क्यों नहीं है? द्रोणाचार्य के नाम पर पुरस्कार है, पर एकलव्य के नाम पर नहीं है। शायद कोई पुरस्कार एकलव्य के नाम पर हो भी, पर मुझे सही जानकारी नहीं है। इसलिए में यकीन से कुछ नहीं कह सकता। लेकिन एकलव्य को लेकर मैंने कुछ और बातें उनसे शेयर कीं, जो यहाँ आपके साथ भी शेयर कर रहा हूँ।
दलित साहित्य में एकलव्य पर अभी उल्लेखनीय काम कोई नहीं हुआ है। कुछेक दलित लेखकों ने कुछ लिखा भी है, तो वह उसी कहानी पर आधारित है, जो महाभारत में मिलती है और झूठी है। उसमें एकलव्य का सम्मान इसलिए नहीं है कि वह धनुर्विद्या में महान था, बल्कि इसलिए है कि उसने गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा काटकर उस गुरु को दे दिया था, जिससे उसने धनुर्विद्या सीखी ही नहीं थी।
दरअसल एकलव्य और द्रोणाचार्य की कहानी उतनी ही झूठी है, जितनी झूठी कबीर और रामानंद की कहानी है। जिस प्रकार कबीर ने रामानंद से कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, उसी प्रकार एकलव्य ने भी द्रोणाचार्य से कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। जिस प्रकार रामानंद कबीर के गुरु नहीं थे, उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी एकलव्य के गुरु नहीं थे।
एकलव्य की कहानी हमें महाभारत (1.123.10-39) में मिलती है, जो इस प्रकार है– “द्रोण पांडवों के धनुर्विद्या के गुरु थे और अर्जुन उनका सर्वोत्तम शिष्य था। एक दिन निषाद जनजाति नरेश का पुत्र एकलव्य उनके पास शिष्य बनने  के लिए आया। पर, द्रोण ने, जो धर्म को जानते थे, निषाद पुत्र को शिष्य बनाने से इंकार कर दिया। एकलव्य ने द्रोण के चरणों में अपना सर रखा और जंगल में जाकर द्रोण की मूर्ति बनाकर उसी को गुरु मानकर साधना करने लगा। वह महान धनुर्धर बन गया। एक दिन पांडव कुत्ते को लेकर शिकार के लिए जंगल में गये। कुत्ता वहां एकलव्य को देख कर भौंकने लगा। और तब तक भौंकता रहा, जब तक कि एकलव्य ने उसके मुंह में सात तीर न छोड़ दिए। कुत्ते के मुंह में तीरों को देखकर पांडव बहुत हैरान हुए। वे वहां गये, जहाँ से तीर आये थे। वहां उन्होंने एकलव्य को देखा और पूछा कि वह कौन है? एकलव्य ने अपना परिचय दिया और यह भी बताया कि द्रोण उसके गुरु हैं। पांडव घर चले गये। पर एक दिन अर्जुन ने द्रोण से पूछा कि उन्होंने निषाद पुत्र को शिष्य क्यों बनाया, जो धनुर्विद्या में मुझ से भी महान है? द्रोण, अर्जुन को साथ लेकर एकलव्य के पास गये और उससे कहा कि अगर तुम मेरे शिष्य हो, तो अभी मेरी दक्षिणा मुझे दो। एकलव्य ने कहा कि गुरुदेव आज्ञा दें, अभी तो मेरे पास कुछ है नहीं। द्रोण ने उत्तर दिया कि अपना दाहिना अंगूठा काटकर मुझे दे दो। जब एकलव्य ने ये दारुण शब्द सुने, तो उसने खुश होकर अपना दाहिना अंगूठा काटकर द्रोण को दे दिया। उसके बाद जब एकलव्य ने तीर चलाया, तो उँगलियों ने पहले जैसा काम नहीं किया।
इस कहानी में शुरू में आया है, “द्रोण, जो धर्म को जानते थे”. इसका क्या अर्थ है?  यह कौन सा धर्म है, जो द्रोण जानते थे? जाहिर है कि यह वर्ण धर्म है। इसी धर्म का पालन करते हुए द्रोण ने एकलव्य को शिष्य नहीं बनाया। यह बात समझ में आती है। लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि जब शिष्य बनाया ही नहीं, तो एकलव्य से गुरु दक्षिणा क्यों मांगी गयी? यह बात और भी समझ में नहीं आती कि गुरु दक्षिणा में उसका अंगूठा ही क्यों माँगा गया? यह बात भी समझ में नहीं आती कि एकलव्य ने द्रोण को अपना अंगूठा क्यों काटकर दिया, जबकि वह उसके गुरु थे ही नहीं? यह प्रश्न भी समझ से परे है कि द्रोण ने उस कटे हुए अंगूठे का क्या किया? क्या उसे तलकर खा गये, आखिर मांसाहारी तो थे ही। इन सारे सवालों का जवाब इस कहानी से नहीं मिलता। लेकिन यदि यह मान लें कि यह पूरी कहानी झूठी है, तो हमें सारे सवालों के जवाब तुरंत मिल जायेंगे।
सबसे पहली बात जो हमें समझनी है, वह यह है कि एकलव्य खुद भी राजकुमार था, उसके पिता निषाद नरेश थे। वह धनुर्विद्या सीखने के लिए द्रोण को गुरु बना ही नहीं सकता था। इसके दो कारण हैं। पहला यह कि  वर्ण धर्म में शूद्र  को विद्या देने का अधिकार ब्राहमण को नहीं है, यह बात एकलव्य को न मालूम हो, यह हो ही नहीं सकता। ब्राहमण शूद्र को अपना शिष्य बना ही नहीं सकता, यह जानते हुए एकलव्य द्रोण के पास शिष्य बनने के लिए नहीं जा सकता। दूसरा कारण यह है कि धनुर्विद्या जनजाति समुदाय की पारंपरिक विद्या है। यह विद्या एकलव्य में आनुवंशिक रूप में थी। वह अपने समय का महान धनुर्धर था। धनुर्विद्या में वह इतना निपुण और सिद्ध हस्त था कि द्रोण का सिखाया हुआ अर्जुन उसके सामने कुछ भी नहीं था। कुत्ते के मुंह में इस तरीके से एकलव्य ने सात तीर मारे थे कि कुत्ते का मुंह बंद हो गया था और खून की एक बूंद तक नहीं निकली थी। यह कमाल अर्जुन ने खुद अपनी आँखों से देखा था। यह कमाल ही अर्जुन के द्वेष द्रोण के क्रोध और एकलव्य के विनाश का कारण बना। एकलव्य को अर्जुन से बड़ा धनुर्धर बनने से रोकने के लिए द्रोण ने जो साजिश रची, उसी के तहत एकलव्य का बलपूर्वक अंगूठा काटा गया, अंगूठा उसने दान नहीं किया था।
-    कँवल भारती 
आभार {हस्तक्षेप. कॉम  }