Sunday, 9 December 2012

देश व्यापी पत्रिका की आवश्यकता क्यों है ?


 
पिछले दो सालों के अथक प्रयासों और समाज के तमाम तथाकथित बुद्धिजीवियों से मिलकर समाज की दशा व दिशा की विस्तृत चर्चा करने के बाद हमने एक देश व्यापी पत्रिका निकालने का प्रस्ताव लिया क्योंकि आज मछुआ समाज अनेक जातियों और उपजातियों (निषाद, केवट, मल्लाह, कश्यप, रायकवार, साहनी, तुरैहा आदि) में बंटा हुआ है. जो एक दूसरे को छोटे बड़े के रूप बताते है. समाज के इतिहास के बारे में कोई भी व्यक्ति एकमत नहीं है. जितने लोगों से बात की उतने ही प्रकार का इतिहास सामने आया है. इसके आलावा अधिकतर लोगों को इतिहास के बारे में सही जानकारी ही नहीं है. जो भी जानकारी है कहानी-किस्सों में ही पता है.
मछुआ समाज के लोग सिर्फ जातियों और उपजातियों में ही नहीं बंटे है. बल्कि सभी के अपने-अपने संगठन है जिसका एक दुसरे से कोई समन्वय नहीं है. मछुआ समाज के लोग जातियों, उपजातियों के आलावा राजनीतिक पार्टियों में भी बंटे हुए हैं. जिससे समाज की एकता लगातार खंडित हो रही है. क्योंकि समाज के लोग अलग पार्टियों के साथ सिर्फ पार्टी की भाषा बोलते हैं, समाज की नहीं.
देश भर में मछुआ समुदाय किसी न किसी मुद्दे को लेकर आन्दोलन कर रहा है लेकिन एक दूसरे से कटे होने के कारण किसी भी आन्दोलन व मुद्दों पर अपनी सहमति असहमति की स्थिति में नहीं है. जबकि पुरे देश में समाज के लोग किसी न किसी मुद्दे को लेकर स्वत्रन्त्र आन्दोलन कर रहे हैं. बिना ताकत के ये आन्दोलन आसानी से दबा दिए जाते हैं.
वैश्वीकरण के दौर में मछुआ समाज की चुनौतियां क्या है. इसे कैसे दूर किया जा सकता है, इन मुद्दों पर भी मतभेद हैं. जबकि वैश्वीकरण की नीतियों ने मछुआ समाज के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सभी पहलुओं को प्रभावित किया है और समाज के सामने नई - नई चुनौतियाँ आ रही है. सांस्कृतिक चेतना बहुत कमजोर होने के चलते सही गलत का फैसला नहीं कर पाते बल्कि दूसरों पर आश्रित हैं और अपनी साझी विरासत को भूल चुके है. मछुआ समाज की तमाम जातियों व उपजातियों का अपना इतिहास, भाषा, लोकगीत, लोक-नृत्य व विरासत विलुप्त हो चुकी है. मछुआ समाज सिर्फ जातियों उपजातियों में ही नहीं बंटा बल्कि अमीर और गरीब में भी बंटा हुआ है. जिससे समाज अलगाव का शिकार बनता जा रहा है और मछुआ समाज की बहुसंख्यक आबादी अपमान, शोषण-उत्पीड़न का दंश झेलने पर मजबूर है.
साथियों हमारा मानना है कि हमारा समाज टुकड़ों में भिखर हुआ है जिससे इसकी शक्ति भी बिखरी हुई है, सिर्फ उसको एकता के सूत्र में पिरोने की जरूरत है. यह पत्रिका समाज के इतिहास की एकता और विचारों की एकता पर बल दे रही है जो समाज की एकता को स्थापित करेगा. पूरे देश की राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक गतिविधियों को समाज तक पहुँचायेगा ताकि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह पता चले की समाज के कौन-कौन से अगुआ तत्व समाज के लिए क्या कर रहे हैं. किन मुद्दों को लेकर समाज को आगे बढ़ा रहे हैं. इस पत्रिका के माध्यम से यह भी पता चलेगा कि राष्ट्रीय लेवल पर समाज का नेता कोन  है जो समाज के बारे सबसे ज्यादा सोचता है और हमें क्या करना चाहिए. पत्रिका के प्रत्येक अंक में समाज के इतिहास, विचार और आन्दोलन पर बहस व शोध पत्र भी जारी किये जायेंगे ताकि सम्पूर्ण देश में वैचारिक परिवर्तन हो सके, जो बुनयादी परिवर्तन को जन्म देगी.
पत्रिका की विषय-वस्तु और कलेवर के बारे में आपके सुझावों और आलोचनाओं से इसे बेहतर बनाने में हमें सहयोग मिलेगा ऐसी उम्मीद है.
                                                                                                           

Thursday, 6 December 2012

हाँ! ये भारत को बेच देना चाहते हैं


      पिछले एक माह से भारत का शासक वर्ग ही नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था के पैरोकार भी भारतीय अर्थव्यवस्था के महाशक्ति न बन पाने के लिए मौजूदा हालात की आलोचना कर रहे हैं. ऐसा क्या हुआ जिसके चलते भारत का विश्व की महाशक्ति बनने का सपना इस सब की नजरों से हटता जा रहा है? गौरतलब है कि बीते वर्ष 6.5 आर्थिक वृद्धि दर 9 वर्षों के निचले स्तर पर पहुँच गयी है. इससे सभी विदेशी बैंकों और विश्लेषकों गोल्डमैन साक्स, मार्गन स्तेलनी, सिटी बैंक और एच.एस.वी.सी ने भी देश वृद्धि दर के अनुमान को घटाकर कह रहे हैं कि स्थिति 1991 जैसी आगयी है.
      उद्दोग संगठन “अमेरीका-भारत व्यापार परिषद (यू.एस.आई.बी.) के नए चेयरमैन अजय बंगा ने कहा कि नीतियों में अनिश्चितता के कारण भारत की प्रगति बाधित हो रही है. इससे विदेशी निवेशक निवेश करने से बच रहे हैं. दूसरी तरफ भारतीय प्रतिभूमि विनिमय बोर्ड (सेबी) के अध्यक्ष यू.के.सिन्हा ने कहा कि महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों में साल दर साल होती देरी से निवेशकों की मनोदशा सुधरने तथा कमजोर पड़ती आर्थिक वृद्धि को रोकने की तुरंत आवश्यकता है.
     भारत के उद्दोगपतियों ने भी नीतिगत मोर्चे पर लाचारी की बढ़ती अवधारणा के बीच अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत की आलोचना करते हुए कहा कि इससे भारत की छवि को नुकसान हुआ है. नारायण मूर्ति ने कहा कि भारत के सामने आयी चुनौतियाँ उसने खुद पैदा की हैं, इससे भारत की छवि प्रभावित हुई है. वहीं दूसरी ओर अजीम प्रेम जी ने भी कहा कि हम देश के रूप में किसी नेतृत्व के बिना ही काम कर रहे हैं. अगर हम नहीं बदले तो सालों पीछे चले जायेंगे.
     जब ये सभी भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अपनी नाराजगी जता रहे थे, रही सही कसार स्टैण्डर्ड एंड पुअर्स की चेतावनी ने पूरी कर दी. अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी एंड पुअर्स ने चेतावनी दी है कि वह भारत की निवेश साख घटा सकता है. चेतावनी के पीछे जो कारण बताये गये हैं वो यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत ठीक नहीं है, विकास दर धीमी हो चुकी है तथा आर्थिक सुधारों में राजनीतिक गतिरोध आगे आ रहा है.
वहीं दूसरी तरफ वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच ने भी वित्तीय साख पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है. फिच ने  भ्रष्टाचार, अपर्याप्त सुधर, ऊँची मुद्रा स्फीति का हवाला देते हुए कहा कि देश की वित्तीय हालत आने वाले समय में और बिगड़ने हैं. यही नहीं रेटिंग एजेंसी ने सार्वजनिक क्षेत्र की गेल, इंडियन आयल, एन.टी.पी.सी. व अन्य चार कम्पनियों की क्रेडिट रेटिंग भी हटा दी है.
       आखिर उदारीकरण के पैरोकारों को भारतीय अर्थव्यवस्था की इतनी चिंता क्यों है? अगर इसकी गहराई से जाँच पड़ताल की जाये तो हम पायेंगे कि अभी भी बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ उदारीकरण की नीतियाँ लागू नहीं की गयी हैं. सी.एम.आई.ई. के अनुमान के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष में 5000 अरब रूपये की 500 परियोजनाएं अनिवार्य मंजूरी की वजह से लटकी पड़ी है. यही नही कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ई.पी.एफ.ओ.) के 2,00,000 करोड़ रुपये को बाजार में नहीं लगाया गया है. इसीलिए देशी विदेशी निवेशकों की गिद्ध दृष्टि इस फंड पर बहुत दिनों से लगी हुई है. सेबी के अध्यक्ष ने तो यहाँ तक कहा कि यदि थोड़ा फंड भी बाजार में लग जाये तो इसका काफी मतलब होगा.
      देशी-विदेशी पूंजी भारतीय खेती को अपने अनुकूल ढालना चाहती है इसीलिए वे राष्ट्रिय-अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर यहाँ के खेत, पानी व अन्य प्राकृतिक संसाधनों, लाखो प्रजातियों के पौधो के जीन प्रयोगशालाएं , यहाँ तक कि वैज्ञानिकों तथा किसानों की पैदावार पर पूरी तरह कब्जा चाहते हैं. वे चाहते हैं कि किसानों के लिए ठेका खेती का जो माडल तैयार किया गया है उसे शीघ्र ही लागू किया जाये ताकि कारगिल, मोनसेंटो, आई.टी.सी., महेंद्र एंड महिंद्रा और पेप्सीको जैसी अन्य कम्पनियों का ठेका खेती द्वारा आबाध रूप से मुनाफा कमाने का सपना पूरा हो सके.
      कृषि विविधिकरण के नाम पर सफेद मुस्ली जटरोफा व फूल की खेती को अधिक से अधिक बढ़ावा मिल सके ताकि गेंहू, उड़द, मुंग इत्यादि के आयात के सारे दरवाजे खुल सकें. उदारीकरण के पैरोकार लगातार दबाव बना रहे हैं कि कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली तमाम सहायता समाप्त कर दी जाये तथा खाद प्रसंस्करण में विदेशी पूंजी लगाने की अनुमति शीघ्र अति शीघ्र मिल सके.
    आज भी भारत में लगभग 227 सेज प्रस्ताव (3,00,000 हेक्टेयर जमीन) की परियोजनाए राज्य सरकारों द्वारा रियल स्टेट ब्रोकर की भूमिका निभाने के बावजूद भी जनता के भारी विरोध के चलते अधर में है जिससे देशी-विदेशी निवेशक बहुत ही बेचैन हैं. असल में उदारीकरण के पैरोकार सड़क, बिजली, पानी, बंदरगाह, भवन-निर्माण, सेवा क्षेत्र, खुदरा व्यापर, बीमा व बैंक जैसी संरचनागत निर्माण की अरबों डालर की योजनाओं को जल्द से जल्द शुरू करना चाहता है.
      वास्तव में तमाम पूंजीपतियों एवं उनके द्वारा घोषित एजेंसियों का मकसद नवउदारीकरण के एजेंडे को पूरी तरह से लागू करने के लिए एक ऐसा माहोल पैदा करना है जिससे आम जनता के दिलों दिमाग में ये बात पहुंचाई जा सके कि नव उदारवादी नीतियों के बिना देश आर्थिक विकास के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता है.
वर्तमान नवउदारवादी नीतियाँ किसी भी रूप में देश के हित में नहीं है. इन नीतियों के पैरोकार अपनी परजीवी मानसिकता और जल्द से जल्द अपनी पूंजी के विस्तार को आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं. प्रधानमंत्री भी अपनी यात्राओं के दौरान अंतर्राष्ट्रीय पूंजीपतियों को विश्वास दिलाते हैं कि “हमारी प्रक्रिया भले ही धीमी है लेकिन हमारे देश में मतभेदों से निपटने के कारगर उपाय और कड़े कानून और तरीके है.”
      इन सभी बातों से जाहिर होता है कि पिछले 20 सालों से मेहनतकश जनता को नई गुलामी में जकड़ने की कोशिश की जा रही है. यहाँ तक आर्थिक सुधारों के लिए पक्ष-विपक्ष एक है. लेकिन जैसे-जैसे इन नीतियों के परिणाम सामने आये है जनता ने भी बड़े पैमाने पर प्रतिरोध किया है. आज भारत उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है. यह भावी परिवर्तन के लिए शुभ संकेत है.
                                             - M.C. KASHYAP

Wednesday, 5 December 2012

दशरथ मांझी के गांव में सरकारी पावडर का हाल


दशरथ मांझी कभी गया के आसपास के लोगों के नायक हुआ करते थे, अब बिहार के सरकारी नायक हैं. पहाड़ काट कर रास्ता बना देने के उनके बेमिसाल कारनामे के कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनसे काफी प्रभावित थे. उनके गांव के लोग बताते हैं कि एक बार नीतीश ने उन्हें अपनी कुरसी पर बिठा दिया था और कहा था कि आज जो चाहे मांग लीजिये. तब भूमिहीन दशरथ मांझी ने शायद उनसे पांच एकड़ जमीन की मांग की थी, जो खुदा-न-खास्ता उनके जीते जी उन्हें सरकार दे नहीं पायी. हुक्मरानों का यही हाल है, वे अपने आप को दुनिया का मालिक मांगते हैं और हर चीज का वादा कर बैठते हैं. मगर वादा पूरा करना अफसरों का काम होता है और अफसर को गांधी जी की सुगंध मिली तो ठीक नहीं तो कानून बघारना शुरू कर देते हैं. खैर, जमीन नहीं मिली, हालांकि नीतीश कुमार ने उनके नाम पर महादलित युवक-युवतियों को रोजगारपरक प्रशिक्षण दिलाने के लिए एक योजना शुरू कर दी है, दशरथ मांझी कौशल विकास योजना. अब यह तथ्य भी सवालों के घेरे में है कि इस योजना के तहत कितने महादलित युवक-युवतियों का कौशल विकसित हुआ है, मगर दशरथ मांझी को सरकारी नायक बना देने से नीतीश अपनी पार्टी को जो राजनीतिक लाभ दिलाना चाहते हैं उसमें कुछ संभावना जरूर बनती है... खैर, मीडिया हस्तक्षेप के एक आयोजन के दौरान कई नये-पुराने साथियों के साथ दशरथ मांझी के गांव जाने और देखने का मौका मिला. वहां कई भ्रम टूटे...
सबसे पहले हमारी टोली गेहलौर के उस स्थान पर पहुंची जहां दशरथ मांझी ने अपने 22 साल के पागलपन(लोग उस वक्त यही कहते थे) की वजह पहाड़ को काट कर वजीरगंज और अतरी प्रखंड के बीच की 75 किमी की दूरी को घटाकर एक किमी कर दिया था. उस रास्ते पर सड़क बन चुकी थी और बगल में एक स्मारक भी. हमलोग दो गाड़ियों से थे, तकरीबन 25-30 लोग... हमारे पास दसेक कैमरे रहे होंगे, बांकी मोबाइल वाले कैमरे... जब इतने कैमरे एक साथ क्लिक-क्लिक का शोर मचाने लगे तो जाहिर सी बात है, आसपास के लोगों ने समझ लिया कि ये साधूजी(दशरथ मांझी) का कमाल देखने आये हैं. एक बुलंद आवाज वाली संभवतः मछुआरन(मछुआरनों के सशक्तिकरण का मैं बचपन से कायल रहा हूं) की आवाज अचानक गूंजने लगी, लोग बाग उसके चारो-ओर जमा हो गये. मैं दूर-दूर से ही उनका आख्यान सुनने लगा. ... साधू बाबा के मेहरारू का गगरी फंस के गिर गया तो उसी दिन ठान लिये कि पहाड़ को उख्खाड़ के फेंकिये देना है... मगर महिला दो दर्जन पत्रकारों के सवालों की बौछार में गड़बड़ाने लगीं. बाद में पता चला कि माताजी इस गांव की नहीं हैं, उन्हें तकरीबन उतनी ही जानकारी है जितनी हमें... आसपास के लोगों ने उनके अधजल गगरी छलक जाये वाले आचरण पर बकायदा मगही में उन्हें दोदना भी शुरू कर दिया... रहती हैं पटना में और कहती हैं गेहलौर की बात... जाइये-जाइये.
खैर हम लोग आगे बढ़ गये... दशरथ मांझी के गांव दशरथ नगर की तरफ. गेहलौर पंचायत है और दशरथ नगर गांव. दोनों के बीच सवा किमी का फासला है. दशरथ नगर नाम से कंफ्युजियाइयेगा नहीं. यह नाम सरकारी नहीं है... दशरथ नगर नाम गांव समाज के लोगों ने दिया था. पहाड़ काट देने के बाद दशरथ मांझी अपने इलाके के लिए कोई साधारण हस्ती नहीं रह गये थे. लिहाजा जहां बसे उस जगह का नाम लोगों ने दशरथ नगर रख दिया.
यहां आज भी तकरीबन 50 मुशहर(सरकारी भाषा में महादलित) परिवार रहते हैं, सभी दशरथ मांझी के सगे-संबंधी ही हैं. उनका इकलौता बेटा भागीरथ पांव जल जाने के कारण जो बचपन से चलने फिरने में संघर्ष करता है(विकलांग शब्द का ठीक विकल्प है न, अब लोग नाराज तो नहीं होंगे) सपरिवार रहता है. पत्नी, बेटी-दामाद और नाती-नातिन.... साधू बाबा अब नहीं रहे. गांव बिल्कुल वैसा ही है जैसी बिहार की कोई और मुशहर बस्ती हो सकती है. साधू बाबा के सरकारी नायक बन जाने के बावजूद इसकी सूरत नहीं बदली है, हालांकि लालू सरकार के टाइम से ही इस गांव के चेहरे पर सरकारी योजनाओं का पावडर लगाने की कोशिश चलती रही है. लालूजी के समय गांव में 35 इंदिरा आवास बंटे, मगर इनमें से अधिकतर आवास पड़ोसी जिला नालंदा के बौद्ध खंडहरों जैसे नजर आते हैं. अधिकांश मकान खाली पड़े हैं और लोग वहां कपड़े सुखाते हैं या पुआल रखते हैं, रहने का काम फूस की झोपड़ियों में करते हैं. दो हैंडपंप लगवा दिये गये हैं, मगर दोनों बिगड़ गये हैं लिहाजा लोग एक गंदे कुएं(तसवीर चस्पा है, देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं) का पानी पीते हैं. पहाड़ तोड़ कर रास्ता बना देने वाले इंसान के गांव में किसी को हैंडपंप सुधारना नहीं आता, अगर दशरथ मांझी कौशल विकास योजना के तहत इस गांव के दो युवकों को हैंडपंप सुधारना ही सिखा दिया जाता तो उस योजना की भी एक उपलब्धि होती. एक एनजीओ ने गांव में चार शौचालय भी बनवाये थे(तसवीर लगी है, देख कर सब समझा जा सकता है) मगर कोई उसके पैन में बने छेद में निशानेबाजी करने के लिए तैयार नहीं हुआ. लिहाजा महिला और पुरुष आज भी समभाव से खेतों को उर्वरक उपलब्ध करा रहे हैं. इन्हीं हालात में गांव के लोग यह बहुमूल्य जानकारी भी दे रहे थे कि साधू बाबा को साफ-सफाई से बहुत प्रेम था, इसी वजह से 25-30 साल पहले वे अपने चचेरे भाइयों को गेहलौर गांव में छोड़कर यहां आ बसे थे. इसी संदर्भ में यह सूचना भी दी गयी कि वे अंधविश्वास और नशाखोरी के खिलाफ भी थे.
अच्छा हुआ साधू बाबा गुजर गये, नहीं तो गांव का यह हाल देखते तो वापस गेहलौर लौट जाते. हो सकता है, उन्होंने अपने जीते-जी यह सब देख भी लिया हो...
गांव के लोग साधू बाबा की याद में बहुत कुछ करना चाहते हैं. उन्हें याद है कि साधू बाबा चाहते थे कि गेहलौर प्रखंड बन जाये, अब लोग उनके इस सपने को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. गेहलौर में साधू बाबा के नाम पर जो स्मारक बना है, वहां का पुजारी भागीरथ मांझी(बाबा के पुत्र) को बनाने की पूरी तैयारी है, कहते हैं, बेचारा चल फिर नहीं पाता है, मेहनत मजूरी कैसे करेगा. सरकार अगर वादा पूरा करते हुए पांच एकड़ जमीन दे देती तो इसका थोड़ा भला हो जाता. मगर कोई बात नहीं समाधि स्थल पर बैठेगा तो कुछ न कुछ चढ़ावा मिल ही जायेगा.
सरकार के खिलाफ लोगों में जबरदस्त गुस्सा है, गनीमत है कि रामविलास पासवान जी को यह सूचना नहीं मिली है. मुख्यमंत्री महोदय को तो सूचना मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता, वे आजकल कान में ठेपी लगाकर राज करते हैं. खैर, यहां लोग चप्पल नहीं चलायेंगे इस बात की पूरी गारंटी है. (इस संबंध में एक खबर पंचायतनामा में भी प्रकाशित हुई है)