Thursday, 22 November 2012

मीडिया में औरतों की छवि कितनी सच्ची-कितनी झूठी

मीडिया, यानि फिल्म, टीवी और पत्र-पत्रिकाएँ. इन्हें समाज का आईना कहा जाता है. यानि यह माना जाता है कि समाज में जो कुछ भी हो रहा है, उसकी वैसी ही तस्वीर मीडिया लोगों के सामने पेश करता है. आज का सबसे सशक्त मीडिया है- टेलीविजन, क्योंकि यह दृश्य-श्रव्य माध्यम है और इसकी पहुँच दूर-दूर तक है. तो आइये, इस ‘आईने’ में हम औरतों की तस्वीर को देखते हैं.

टेलीविजन का बटन दबाते ही एक तस्वीर दिखेगी, कैटवाक करती किसी माडल की, तो दूसरे ही क्षण उसी चैनल पर साड़ी में सलीके से लिपटी पतिव्रता स्त्री की तस्वीर दिखाई जाएगी. कभी ऐश्वर्या राय और प्रियंका की खूबसूरती के राज बताये जायेंगे, तो दूसरी ओर उसी नेटवर्क पर किसी देवी की कहानी और उनके तथाकथित औरत धर्म का गुणगान किया जायेगा. कभी पूरे घर को खुश रखने के लिए अपनी इच्छाओं का गला घोंट देने वाली आदर्श गृहणी का, तो कभी अराजकता की हद तक अपनी मर्जी से जीती, भोग-विलास में लीन किसी स्वार्थी लड़की का चित्र. एक तीसरी तस्वीर भी है जिसमें औरत अपनी पहचान और आजीविका के लिए नौकरी करती है, पर घर की ख़ुशी या शादी में बाधा आने पर नौकरी  छोड़ देती. चाहे वह बहुत बड़े पद पर ही क्यों न हो, सास ससुर, पति की सेवा वह अपना प्रमुख धर्म समझती है. उस औरत की समाज में काफी प्रतिष्ठा है, पर घर में वह अपने पति की आज्ञाकारी पत्नी होती है. आज कल मीडिया औरतों की इस तस्वीर को खूब सजा संवार कर पेस कर रहा है.

मीडिया के एक माध्यम, टेलीविजन में औरतों की ये तीन तस्वीरें एक साथ ही पेश की जा रही हैं. औरतें  दुविधा में हैं कि वास्तव में कौन सी तस्वीर उनकी अपनी है या कौन सी तस्वीर उनकी होनी चाहिए. मीडिया पर दिखाई जाने वाली यह तस्वीर सिर्फ तस्वीर ही नहीं होती, बल्कि हमारे सामने एक आदर्श भी प्रस्तुत करती है कि “औरतों को ऐसा ही होना चाहिए‘’. तो आइये  विचार करते हैं कि इनमें से कौन सी तस्वीर हमारी है या होनी चाहिए .

पहली तस्वीर जो कि कोई उत्पाद बेचती या कैटवाक करती किसी माडल की है जिसे देखकर लगता ही नहीं कि वह हमारे समाज की लड़की है. उसके लिए छेड़छाड़, बलात्कार जैसी समस्या है ही नहीं, क्योंकि उसकी सुरक्षा की दीवार बहुत मजबूत है. उसकी मुख्य समस्या है कैसे अपने आपको ज्यादा से ज्यादा खूबसूरत बनाया जाये. उसकी समस्या और हमारी समस्या में कोई ताल मेल ही नहीं है. लगता है कि वह किसी दूसरी दुनिया की प्राणी है. अतः यह हमारी तस्वीर हो ही नहीं सकती.

दूसरी तस्वीर जो कई सदी पीछे की है, पर जिसे आजकल खूब चमकाकर पेश किया जा रहा है, वह है एक पतिव्रता स्त्री, आज्ञाकारी बहू-बेटी और त्यागमयी माँ की. धार्मिक-पारिवारिक धारावाहिकों के माध्यम से औरतों के सामने यह तस्वीर पेश की जा रही है. इन औरतों के लिए सबकुछ उनका परिवार ही होता है और ये सारी जरूरतों के लिए घर के पुरुष सदस्यों का मुँह देखती हैं. पहली तस्वीर वाली औरत को जितना ही उच्चश्रृंखल, गैरजिम्मेदार, खुदगर्ज और भोगवादी दिखाया जाता है, उतनी ही तीक्ष्णता से दूसरी तस्वीर की परम्परावादी और यथास्थितिवादी औरत आम दर्शकों को सहज स्वाभाविक लगने लगती है. हमारे समाज की ज्यादातर औरतों की जिन्दगी दूसरी तस्वीर से ज्यादा मेल खाती है और इस तस्वीर को महिमामंडित करने का मकसद उन्हें इसी स्थिति में बने रहने की प्रेरणा देना है. इसलिए कि भले ही औरतें आज घर में सिमटी हुई हैं पर समाज विकास के कारण घर से बाहर निकलकर पढ़-लिखकर नौकरी करने का सपना भी आज की औरतें देखने लगी हैं. आज औरतें निहायत पारम्परिक होकर नहीं जीना चाहती. वे अपनी पहचान और अस्तित्व के लिए सचेत हैं. वे इस घुटन से बाहर आने के लिए छटपटा रही हैं जबकि मीडिया उन्हें वापिस घर में लौटने का मूल्य परोस रहा है, जो कि वास्तव में एक अपराध है.

तीसरी तस्वीर जो देखने में काफी लुभावनी लगती है, जिसे देखकर लगता है कि दुनिया की सारी औरतें पढ़ी-लिखी और सभी आत्मनिर्भर हैं. सीरियलों में इन औरतों को इतना समर्थ दिखाया जाता है, जिसमें वे दफ्तर और घर दोनों का काम अत्यंत दक्षता के साथ करती हैं- बगैर थके, बिना किसी चिड़चिड़ाहट और गुस्से के. उसकी यह छवि देखकर आश्चर्य होता है कि कोई इन्सान इतना समर्थ कैसे हो सकता है. कहीं न कहीं इस तस्वीर के माध्यम से वे यह भी पुष्ट करना चाहतें हैं कि औरत कितना भी पढ़-लिख जाये, कुछ भी बन जाये, घरेलु जिम्मेदारियां तो उसे ही निभानी है. विज्ञान टेक्नोलॉजी चाहे जहाँ पहुँच जाये घरेलु श्रम उसके हिस्से का ही है. यदि उसमें खरीदने की क्षमता हो तो वह कपड़े हाथ से नहीं, वाशिंग मशीन से धो रही है और घर की सफाई वैक्यूम क्लीनर से कर रही है. लेकिन काम की जिम्मेदारी उसी की है. हमारे समाज में स्त्रियों की स्थिति टीवी में दिखने वाली इस तस्वीर के विपरीत है. विश्व बैंक के ताजे सर्वक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश में 90 प्रतिशत औरतों को घर से बाहर कदम रखने के लिए पुरुषों की इजाजत लेनी पड़ती है तथा निर्णय लेने का अधिकार अभी भी एक तिहाई औरतों को नहीं है. टीवी पर दिखने वाली इन औरतों को भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर दिखाया जाता है, पर मानसिक रूप से वे भी अपने पिता, पति या पुत्र पर निर्भर रहती हैं. ये पुरुषवादी जकड़न को तोड़ने में लगी हुई तो दिखाई जाती हैं पर अंततः ख़ुशी-ख़ुशी समझौता भी कर लेती हैं. यह तस्वीर औरतों की आजादी के लिए ज्यादा खतरनाक है क्योंकि इनमें इन समझौतों को इतने सुन्दर तरीके से पेश किया जाता है कि हमें लगता है कि “हाँ ऐसा ही होना चहिए.” जाहिर है कि हमारे सामने जब वैसे ही परिस्थिति आएगी तो हम भी वैसा ही करेंगे और अपनी आजादी खो देंगे.

इन तस्वीरों पर गहराई से विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि दरअसल ये तीनों ही तस्वीरें औरत विरोधी और पुरुषवादी मानसिकता की पोषक हैं. पहली, औरत को शरीर के रूप में पेश करती है, दूसरी पुरुष की दासी के रूप में और तीसरी तस्वीर गलत समझौते को आदर्श मूल्य बनाकर पेश करती है.

ये तीनों ही तस्वीर औरतों को छल और बरगलाने वाली हैं. अतः मीडिया के इस झूटे आईने को तोड़कर हमें अपनी एक नई तस्वीर तलाशनी होगी जिसमें औरत इस सड़े-गले, पिछड़े समाज की मूल्यों-मान्यताओं से जूझ तो रही होगी पर उसके चेहरे पर अपने पिछले संघर्षों की दमक भी होगी, उन संघर्षों की दमक जिनके बल पर उसने ढेर सारे अधिकार हासिल किए हैं और ढेरों अधिकार अभी उसे हासिल करने हैं. यही हमारी सच्ची तस्वीर होगी.                 
                                            -सीमाश्रीवास्तव

Wednesday, 21 November 2012

कविता : आओ कसाब को फाँसी दें

                                                                  -अंशु मालवीय
आओ कसाब को फाँसी दें !

उसे चौराहे पर 
फाँसी दें !

बल्कि उसे उस चौराहे पर 
फाँसी दें

जिस पर फ्लड लाईट लगाकर

विधर्मी औरतों से बलात्कार किया गया

गाजे-बाजे के साथ

कैमरे और करतबों के साथ

लोकतंत्र की जय बोलते हुए

उसे उस पेड़ की डाल पर 
फाँसी दें

जिस पर कुछ देर पहले खुदकुशी कर रहा था किसान

उसे पोखरन में 
फाँसी दें

और मरने से पहले उसके मुंह पर

एक मुट्ठी रेडियोएक्टिव धूल मल दें

उसे जादूगोड़ा में 
फाँसी दें

उसे अबूझमाड़ में 
फाँसी दें

उसे बाटला हाउस में 
फाँसी दें

उसे 
फाँसी दें.........कश्मीर में

गुमशुदा नौजवानों की कब्रों पर

उसे एफ.सी.आई. के गोदाम में 
फाँसी दें

उसे कोयले की खदान में 
फाँसी दें.

आओ कसाब को 
फाँसी दें !!

उसे खैरलांजी में 
फाँसी दें

उसे मानेसर में 
फाँसी दें

उसे बाबरी मस्जिद के खंडहरों पर 
फाँसी दें

जिससे मजबूत हो हमारी धर्मनिरपेक्षता

कानून का राज कायम हो

उसे सरहद पर 
फाँसी दें

ताकि तर्पण मिल सके बंटवारे के भटकते प्रेत को

उसे खदेड़ते जाएँ माँ की कोख तक......और पूछें

जमीनों को चबाते, नस्लों को लीलते

अजीयत देने की कोठरी जैसे इन मुल्कों में

क्यों भटकता था बेटा तेरा

किस घाव का लहू चाटने ....

जाने किस ज़माने से बहतें हैं

बेकारी, बीमारी और बदनसीबी के घाव.....

सरहद की औलादों को ऐसे ही मरना होगा

चलो उसे रॉ और आई.एस.आई. के दफ्तरों पर 
फाँसी दें

आओ कसाब को 
फाँसी दें !!

यहाँ न्याय एक सामूहिक हिस्टीरिया है

आओ कसाब की 
फाँसी को राष्ट्रीय उत्सव बना दें

निकालें प्रभातफेरियां

शस्त्र-पूजा करें

युद्धोन्माद,

राष्ट्रोन्माद,

हर्षोन्माद

गर मिल जाए कोई पेप्सी-कोक जैसा प्रायोजक

तो राष्ट्रगान की प्रतियोगिताएं आयोजित करें

कंगलों को बाँटें भारतमाता की मूर्तियां

तैयारी करो कम्बख्तो ! 
फाँसी की तैयारी करो !

इस एक 
फाँसी से

कितने मसले होने हैं हल

निवेशकों में भरोसा जगना है

सेंसेक्स को उछलना है

ग्रोथ रेट को पहुँच जाना है दो अंको में

कितने काम बाकी हैं अभी

पंचवर्षीय योजना बनानी है

पढनी है विश्व बैंक की रपटें

करना है अमरीका के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास

हथियारों का बजट बढ़ाना है...

आओ कसाब को 
फाँसी दें !

उसे गांधी की समाधि पर 
फाँसी दें

इस एक काम से मिट जायेंगे हमारे कितने गुनाह

हे राम ! हे राम ! हे राम !

"मछुआ समुदाय पूरे भारत में लगभग 10 करोड़ की आबादी..."


मछुआ समुदाय पूरे भारत में लगभग 10 करोड़ की आबादी वाला समाज है | 150 से ज्यादा जातियों और उपजातियों में बंटा ये समाज भारत के प्रत्येक राज्य में अलग अलग स्टेटस रखता है | यानि किसी राज्य में SC, कहीं ST, कहीं विमुक्त जाति (NT) , कहीं OBC तो कहीं Gen | दिल्ली का मल्लाह SC ,यूपी का OBC , मध्य प्रदेश का ST | मध्य प्रदेश की कहानी और भी अजीब है |यहाँ रैकवार OBC में, धीवर SC में, मल्लाह OBC में, मांझी, मझवार ST में , बथुड़ी (बाथम) ST में, नावडा व तुरैहा OBC में | .मजाक बना रखा है !!! मध्य प्रदेश के ही हमारे कीर भाई ST में हैं जबकि हिमाचल प्रदेश के कीर SC में, तो पंजाब व राजस्थान में OBC में रखे गए हैं |
ये अन्याय मछुआरों के अतिरिक्त भारत में किसी अन्य समाज से बिलकुल भी नहीं है | ये गैरबराबरी और ज़हर का प्याला हमारे समाज के हिस्से में ही आया है | सरकारों ने इस समाज के लोगों को सौतेली औलाद की तरह रखा और कुछ न दिया गया | विकास की दौड़ को हमने तमाशबीन बनकर ही देखा और दूसरों की जीत पर तालियाँ ही बजाते रहे हैं | हमारे आरक्षण के नाम पर कदम कदम पर विसंगतियां खुद सरकारों ने ही पेश कीं, समाज को सिवाय झूठे आश्वासनों के अलावा आज तक कुछ नहीं दिया | योजनायें हमारे लिए आज भी सपना सरीखा हैं |
हमारे लोग भी कितने सीधे हैं कि सरकार कोई सा भी प्रमाण पत्र दे , चुपचाप ले लेते हैं | विरोध तक नहीं करते | क्या ये सरकारों की धोखाधडी नहीं है अशिक्षित और कानूनी दांव पेचों से अनभिज्ञ लोगों से ? क्या कोई बता सकता है कि केवट, मल्लाह, मांझी (मझवार), नाविक में शाब्दिक रूप से कोई अंतर है ? भारत के प्रत्येक शब्दकोष में इनके मायने एक ही हैं तो ये कमज़र्फ सरकारें इसे अलग अलग करने पर क्यों तुली हैं ?. फिशर मैन / मछुआरा शब्द बुरा नहीं हैं | एक दम स्पष्ट है, सही सामाजिक पहचान द्योतक है , पारंपरिक है,
अपमान जनक तो कतई नहीं है  टाइटिल तो कुछ  भी लिख सकते हैं |
                                                                                                        -Nishad Bansuri

Saturday, 17 November 2012

कुदंकुलन सयंत्र के विरोध में मछुआरो का प्रतिरोध

आज कुदंकुलन परमाणु संयत्र का विरोध कर रहे लोगो पर तमिलनाडु सरकार ने अपनी गुंडई दिखा दी. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा करने वाली सरकार ने दिखाया के लोगो के भय और आक्रोश के उसे कोई परवाह नहीं है. कुदंकुलन सयंत्र के विरोध में भरी संक्या में ग्रामीण मच्चुअरो के प्रतिरोध के चलते पहले सरकार ने झूठे वायदे किये. क्या आप जान सकते है के ७००० लोगो पर रस्त्रद्रोह का मुक़दमा लगाया गया है और लगभग ४०,००० पर अन्य मुक़दमे लगाये गए हैं. शर्मनाक बात यह है के एक सयंत्र के लगने पर भी सरकार ने कोई भी प्रयास नहीं किया के लोगो की बात सुनी जाए.
हमें पता है के भारत को बिजली की जरुरत है. सबको पता है. लेकिन हमें यह भी देखना है के देश के निर्माण के नाम पर जो लोगो का बलिदान किया जाता है उस पर सवाल करने की जरुरत है. चाहे कुडनकुलम हो या ओम्कारेश्वर, देश के विकास के नाम पर लोगो की बलि दी गयी है. आज़ादी के बाद से भारत में ६-८ करोड़ लोग विस्थापित हुए है. इसका ४०-५०% यानि लगभग ३-४ करोड़ लोग आदिवासी समाज के लोग है जिन्हें दुबारा नहीं बसाया जा सका. शेष लोग दलित और पिच्च्दी जातियों से हैं. 
ओंकारेश्वर में सरकार ने किसी को भी एक इंच जमीन नहीं दी. सरकार ने कोर्ट में साफ़ कहा के उसके पास जमीन नहीं है. यह मध्य प्रदेश सरकार उद्योगों के लिए २० हज़ार हेक्टारे जमीन १५ सितम्बर तक देने को तैयार है. कोयले घोटाले में उद्योगपतियों की बदमाशियों के राज तो अभी पूरे तरीके से खुले नहीं है. सवाल यह है के जब सरकार ने संविधान में किये गए अपने वायदों को पूरा नहीं किया तो उसको लोगो को बेदखल करने का क्या कोई अधिकार है.
५० वर्ष के बाद भी देश में लोग भूख से मरते है. जब उसे कोई बताये के भारत ने श्रीहरिकोटा से कोई यान छोड़ा है तो भूखे मजदूर को उससे क्या लेना. क्या उस भूख में रहते हुए उसे देश के प्रगति पर कोई गर्व हो सकता है. यह कैसी प्रगति जहाँ लोग भूख से मर रहे हैं. 
कुदंकुलन के लोगो की अपनी चिंताएं है. २००४ में मैंने वहां का दौरा किया था और मेरे मित्र उदयकुमार ने मुझे पूरे क्षेत्र दिखाए जो भारत के विकास ने नाम पर समाप्त होने जा रहा था. अपने जीवन में कुच्छ इलाको में जाकर मुझे हमेशा अपनापन और खूबसूरती दिखाई दी और उसमे तमिलनाडु राज्य और कन्याकुमारी का क्षत्र है. समुद्र का इतना खूबसूरत नज़ारा बहुत कम दिक्खाई देता है लेकिन आज उस क्षेत्र की ख़ूबसूरती को विकास ने डंक मार दिया है. वोह खूबसूरती नहीं दिखाई देती जो थी. उस वक़्त जब मैं और उदय समुद्र में बालू माफिया के पास गुजरे और मैं कुच्छ तस्वीरे खींच रहा था तो हमें धमकी दी गयी के चुप चाप चले जाओ. मैं मछुआ समाज के नेताओ से मिला जो इस प्लांट का विरोध कर रहे थे. उनके विरोध बिजले से नहीं अपितु अपनी जिन्दगी से है. मैं मान सकता हूँ लोग परमाणु सयंत्रो का विरोध कर रहे हैं वो उसके विश्श्ग्य हैं मैं नहीं लेकिन चेर्नोब्य्ल, भोपाल, फुकिशामा और अन्य स्थानों पर हुई दुर्घटनाओ को अच्छे से जानता हूँ और मुझे विश्वास है के कुदंकुलन के लोग, बच्चे सब इसी बात से चिंतित है. यह चिंता श्रीलंका की भी है क्योंकि किसी भी दुर्घटना की स्थिथि में उनके यहाँ भी गंभीर संकट पैदा हो सकता है.
बहस बिजली या विकास की नहीं है. भारत का नागरिक होने के नाते अगर सरकार किसी की गरीबी नहीं दूर कर सकती है तो न करे लेकिन लोगो की बनी बनाई जिंदगी को खत्म करने का अधिकार उसे नहीं है. अंतरास्ट्रीय कानूनों के अनुसार सरकार को कोई भी  परियोजना शुरू करने से पहले लोगो को उसकी पूरी जानकारी देनी पड़ते है और फिर यदि लोग चाहे तभी कोई योजना लागू की जा सकती है. क्या भारत सरकार या राज्य सरकारों ने कभी भी ऐसा किया के लोगो को किसी योजना की जानकारी दी हो अन्यथा कोई क्या अपने के बर्बाद करने के लिए किसी परियोजना का समर्थन करता है क्या. भारत की स्थिथि जापान और जर्मनी जैसी नहीं है जो गंभीरता से विकल्पों की तलाश कर रहे हैं. 
बिना किसी विकल्प दिए लोगो को उनकी जमीन से बेदखल करना क्या रास्त्र द्रोह नहीं है. ७००० लोगो पर रस्त्रद्रोह  का आरोप लगाना क्या मज़ाक नहीं है. बाबरी मस्जिद के विध्वंश और दिल्ली में १९८४ के सिख विरोधी दंगो के बाद या गुजरात में २००२ के खून खराबे पर तो एक भी व्यक्ति पर देशद्रोह का आरोप नहीं लगाया गया. और तो और, अभी तक सामान्य कानून के तेहत भी कोई सजा  नहीं हो पायी है लेकिन अपनी जमीन के लिए अहिंसात्मक आन्दोलन करना देशद्रोह कैसे हो सकता है ? क्या सरकार को हमारी आज़ादी और हमारे जीवन को लेने का अधिकार है ? आज समय आ गया है जब हमें ऐसे कानूनों का विरोध करना चाहिए जो देश के लोकतंत्र को कमज़ोर करते हैं और लोकतंत्र के नाम पर राज कर रही ताकतों को फासीवादी अधिनायकवाद की तरफ ले जाते हैं.
कुदंकुलन के संघरशील साथियो को हमारा सलाम और हम उम्मीद करते हैं के सरकार उनकी बातो को सुनेगी और उन्हें अपराधी नहीं बनाएगी. ऐसे अधिकारीयों के खिलाफ कार्यवाही की जाए जिन्होंने निहत्थे लोगो पर गोलियां चलायी और लाठिया बरसाई.                                - विद्या भूषण रावत

Friday, 16 November 2012

अन्तर्रष्ट्रीय नदी महोत्सव बनाम मणिलाल मांझी के सपनो का एक बार और मर जाना


२१-२२ -२३ मार्च २०१० में देश,विदेश के बड़े बड़े पर्यावरण चिन्तक मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बांद्राभान नाम के रेतीले तट पर अंतर्राष्ट्रीय नदी महोत्सव में शिरकत करने पहुंचे,इस रेतीले तट पर आलिशान तम्बू और पाश्चत्य शैली की टट्टिया बनवाई गई क्यूंकि देशी विदेशी सभ्रांत लोग यहाँ पर आने वाले थे जिनके घुटनों ताकत नहीं थी की वो उकडू बैठ कर निस्तार कर सके चलो छोरिये इस बात को ये हमारी नाराजगी का मुद्दा भी नहीं है या यूँ कहे की इसमें देशी शैली की टट्टी की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि नर्बदा के तटीय किनारों में रहने वाले मछुवारे और डंगर बाड़ी लगाने वाले मेहनतकश इस कार्यक्रम का हिस्सा भी नहीं थे , पूरे तट को लकड़ी के टुकडो से पाटा गया कुल मिलाकार काफी पैसा इस आयोजन में फूँका गया,कोई भी कार्यक्रम को चूंकि सफल बनाना ही होता है इसलिए ही भजन गायिका अनुराधा पौडवाल और रेत पर कलाकृति उकेरने वाले कलाकार सुदर्शन पटनायक को भी आमंत्रित किया गया,कुलमिलाकर तीन दिवसीय अनुशासनात्मक मस्ती श्री अनिल माधव दवे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऐसे सदस्यों ने की जो अब जन अभियान परिषद् नामक संघ परस्त, या यूँ कहिये कि भा जपा कि समाज सुधार कि दुकान में बड़े पदों पर रहकर खूब पैसा कमा रहे है ख़ैर नदी चूंकि सभी कि है तो हर कोई ये जिम्मेदारी ले ही सकता है चिंता सभी को हो ही सकती है नदी की ।पर मेरी चिंता थोड़ी अलग किस्म की है ( यार बुरा मत मानना में कोई नामी गिरामी शख्स नहीं हूँ एक तरबूज चोर हूँ जो नर्बदा (नर्मदा ) में तैरते तैरते मणि लाल मांझी जैसे किसानो की तरबूज की फसल मैं से एकाध तरबूज चुराकर कर खा जाता था,) पर मेरी चिंता भी तो जायज है आपके लिए न सही मेरे लिए तो है ही कम से कम,चिंता का कारण भी मेरे हिसाब से बाजिव ही है क्यों की मेरे मोहल्ले के लड़के अब मणिलाल मांझी की बाड़ी में से तरबूज चुरा कर नहीं खा पा रहे थे,तो सोचा की मणि लाल मांझी से मिला जाये जरा हाल चल पुछा जाए कुछ गम्मत लगाईं जाए.की तरबूज की खेती (बाड़ी ) के क्या हाल है कितना उग रहा है कंहा कहाँ बेच रहे हैं ,इन्ही सवालो को लेकर चल दिए नर्बदा तट पर मणि लाल मांझी से मिलने . वहा जाकर देखा तो मणि लाल अपने कच्छे में क्यारिओं के बीच में घूमते नजर आये.हमने पुछा की क्या हाल है, कुछ डंगरा कलिंदा (तरबूज खरबूज )तो खिलो दो भैया. मणि भैया ने कहा की रुक जाओ एक महिना अभी फलन वारी है फसल ,फिर खिवाहे,तो हमने पूछा की परकी साल(पिछले साल ) केसी भाई थी फसल ? कहन लगे की कहाँ भई परकी साल हमे ही बाज़ार से मोल लाने पड़े थे खाने काजे.हमारे मन में आया की हुआ क्या है ? थोडा तफसील से पूछा तो कहन लगे जब से जो ठठरी बंधो बाँध बनो हैं तब से तो फसल ही कहाँ बचती है,हमें समझ में नहीं आया की बाँध से फसल का क्या लेना देना और आये भी क्यों समझ हमें, नदी बाँध,महोत्सव इन सबसे लेना देना ही क्या है हमारा,हमें तो मणि लाल के मीठे तरबूज से मतलब था,फिर भी पुछा की क्या होता है बाँध से? कैसे आपकी फसल ख़राब हो जाती है? कहन लगे अरे कछु नहीं जे नासपीटे हर कभी पानी छोर देते हैं जैसे ही पानी का स्तर बढ़ता है पूरी क्यांरिया बह जाती है रोपा गल जाता है,अब परकी साल हमने तीन बार रोपा लगाया और तीनो बार ही गल गया, कर्जा हुआ सो ब्याज में,हमने पुछा की बांध बने तो कई साल हो गए फिर. तो कहने लगे की भईया जब जे बंधान नहीं तो तब तो इतनी उम्दा होती थी खेती की कछु पूछू ही मति चार महिना मेहनत करत थे और आठ महीना खात थे उसमे भी व्याब शादी सब कछु कर देत थे, इत्तो बढ़िया काम थो हमारो भोपाल को ठेकेदार आत थो इते और खड़ी की खड़ी फसल नकद में खरीद लतो थो,कितनी जगह में आप फसल लगाते थे बस जा गर्मी शुरू भई नै की रेता निकली और आधे पात पर डंगरा कलिंदा और सब्झी को काम शुरू हो जात थो,ठेके होत थे बा ज़माने में, तहसील में जाकर लगान जमा करना पडत थो,और हमरे डंगरा कलिंदा भोत दूर दूर तक बिकने जात थे,हम सब भैया वीर और बाई चारी मिलकर मेहनत कर्ट थे और बम्बोलियाँ (नर्मदा के ऊपर बनाये लोक गीत ) गात थे.अब न तो वो गीत बचे और न ही डंगर बाड़ी. ये शायद मणिलाल मांझी के सबसे हसीन दिन के वाकये थे जिन्हें सुनाते हुए उनकी आँखों में चमक साफ़ दिखाई पड़ रही थी. 

(पिछली गर्मियों के दिनों भोपाल में अपनी अम्मा के साथ सब्जी खरीदने हाट गया था तब वहा एक दुकान दार तरबूज बेच रहा था " आन्ध्र प्रदेश के मीठे तरबूज " मैंने पुछा की नर्बदा के तरबूज नहीं आ रहे हैं क्या ? उसने कहा नहीं वो तो काफी समय से नहीं आ रहे है !!)

मैंने मणि लाल से पूछा की जब खेती फायदे की नहीं रही तो फिर क्यों उगाते हो ?

अब इत्ती बड़ी जमीन में हम थोड़ी उगा रहे है भैया .थोड़ी एकन जगह में कोशिश कर लेत है मन नई मान तो. और लगान ?
तो कहने लगे की तहसील से अब कोई आत ही नहीं है बोलने,और आ भी गाओ तो अब काय को लगान,
तो इस बार आप को फसल मिलेगी क्या ??
हाँ जा दान तो पानी थोड़ो एक सो ही है तो उम्मीद तो है!
चलो अब में चलू क्यारिओं में खातोरा (खाद) डालना है !!
अच्छा मणि भैया एक बात तो बताओ की ये बांद्राभान में जो कार्यक्रम होने जा रहा है नदी वाला उसकी कोई खबर है की नहीं ???
कौन सो भैया हमें कछु नयी मालूम ??


 

ये अनोपचारिक बातचीत २० मार्च २०१० को मणि लाल मांझी से हुई और २१ मार्च २०१० को अंतर्राष्ट्रीय नदी महोत्सव शुरू हुआ जिसमे आये लोगो को नर्मदा नदी में पानी का स्तर दिखने क लिए वापस बाँध से पानी छोड़ा गया और मणि
लाल समेत पता नहीं कितने किसानो की तमाम क्यरिआ पानी में बह गयी .
अनिल माधव जी ये कौन सा तरीका है आपका नदी की संस्कृति बचाने का ?
जिसमे न तो आप मछुवारों को शामिल करते हो,और न ही नर्मदा के किनारों पर रहने वाले नर्मदा को जान ने वाले लोगो को ?
और यदि वो शामिल होना चाहे तो आप १५०० रु मांगोगे !
आपके तमाम मुद्दों में बांध की बात क्यों नहीं होती??
विस्थापन की बात से आप क्यों कन्नी काट लेते हो ?
में आपको याद दिला दूँ की नर्मदा तट पर प्रतिवर्ष नर्मदा जयंती महोत्सव होता है और उसमे भी गाने और नाचने के  लिए कलाकार आते है फिर आप काहे नाहक परेशान होते है?
खैर हमें तो इनके जबाव चाहिए ही है आप न दो तो भी हम ढून्ढ ही लेंगे.
पर दोगे तो आपको भी अच्छा लगेगा और मणि लाल भी थोडा सावधानी से अपनी फसल लगा लेगा.
ताकि उसका कर्जा और न बढे
इसी आशा के साथ मणि लाल का साथी और नर्मदा को माँ नहीं कहने वाला
                                                                                                                     -पल्लव